न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा न किसी काल में जन्म लेता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य-निरन्तर रहने वाला, शाश्वत और पुरातन (अनादि) है। शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता। 
व्याख्या : 
🔸भावार्थ यह है कि शरीर में होने वाले समस्त विकारों से आत्मा परे है। जन्म अस्तित्व वृद्धि विकार क्षय और नाश ये छः प्रकार के परिर्वतन शरीर में होते हैं जिनके कारण जीव को कष्ट भोगना पड़ता है। एक मर्त्य शरीर के लिये इन समस्त दुःख के कारणों का आत्मा के लिये निषेध किया गया है अर्थात् आत्मा इन विकारों से सर्वथा मुक्त है। 
🔸शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश।जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः आत्मा अजन्मा, नित्य-निरन्तर रहने वाला, शाश्वत और पुरातन (अनादि) है।

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