॥॥32॥॥ प्रमादी का पतन असंभव है –निगाम तिस्स स्थविर की कथा


॥॥32॥॥ प्रमादी का पतन असंभव है –निगाम तिस्स स्थविर की कथा 

निगाम तिस्स नामक एक स्थविर का जन्म श्रावस्ती के पास के एक क़स्बे में हुआ था। जब वह बड़ा हुआ तब उसने प्रव्॒ज्या ग्रहण कर ली और भिक्षु का जीवन जीने लगा। वह भोजन दान के लिए बड़े-बड़े आयोजनों में नहीं जाता था बल्कि पास के गाँवों में जाता था, जहां के निवासी उसे जानते भी थे, इस तरह भिक्षाटन में जो कुछ भी रूखा-सूखा मिल जाता उसे खा लेता और पुनः साधना में लग जाता। अन्य भिक्षु, अक्सर भिक्षु निगाम तिस्स के विषय में चर्चा किया करते और कहते कि इस भिक्षु ने घर-द्वार तो छोड़ दिया है पर उसका मोह अभी समाप्त नहीं हुआ है।वह हमेशा अपने सगे-सम्बन्धियों से ही भोजन-दान लेता है।भिक्षुओं ने इस विषय में तिस्स की तथागत बुद्ध से शिकायत की। तब तथागत बुद्ध ने तिस्स को बुलाकर पूछा, "मुझे शिकायत मिली है कि तुम अपने सगे-सम्बन्धियों के यहाँ आते-जाते हो।क्या यह सही है?" तिस्स ने तथागत बुद्ध को प्रणाम किया और स्पष्ट किया, "भगवन !यह सच है कि मैं बार-बार अपने गाँव जाता हूँ।लेकिन, मैं ऐसा सिर्फ इसलिए करता हूँ कि भिक्षा मिल जाए।जैसे ही भिक्षा मिल जाती है मैं लौट आता हूँ।आगे एक कदम भी नहीं बढ़ाता। मैं, जो भी भोजन मिलता है उसे खा लेता हूँ।मैं यह नहीं देखता कि भोजन स्वादिष्ट है या नहीं। मैं उसी से संतुष्ट हो जाता हूँ "

तथागत बुद्ध ने भिक्षुओं के सम्मुख तिस्स की प्रशंसा की और कहा कि भिक्षुओं को तिस्स के समान होना चाहिए। अपनी आवश्यकता के मुताबिक मिले हुए दान से जीवन चलाना चाहिए | इस सम्बन्ध में तथागत बुद्ध ने कथा सुनाई।

किसी समय एक गूलर के पेड़ पर पक्षी राज तोता रहता था।उसके साथ उस वृक्ष पर अनेक पक्षी भी रहते थे।धीरे-धीरे पक्षी सारे गूलर खा गए। वृक्ष फलहीन हो गया। सभी पक्षियों ने दूसरी जगह जाने का विचार बनाया। पक्षीराज नेकहा, "तुम लोगों को जाना है तो जाओ। मैं इस पेड़ को छोड़कर नहीं जाऊँगा।जो कुछ भी बचे-खुचे फल हैं उन्हें ही खाकर मैं अपना जीवन चला लूँगा।चाहे जो भी हो,मैं रहूँगा यहीं पर"

सभी पक्षी चले गए पर वह पक्षी राज तोता, वहीं रुक गया। उसी समय इन्द्र तथा उसकी पत्नी सुजाता ने उसकी परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने पेड़ को इस प्रकार हिलाया मानों वह गिर रहा हो जिससे ऐसा लगा कि तूफान आ गया हो या किसी बाज ने झपट्टा मारा हो मगर वह तोता फिर भी कहीं नहीं गया। तब इन्द्र तथा सुजाता ने उससे पूछा कि वह पेड़ छोड़कर क्‍यों नहीं गया ? उसने जवाब दिया कि उस पेड़ के साथ उसकी कृतज्ञता का भाव जुड़ा हुआ है। अतः वह उसे छोड़कर नहीं जा सकता।

वास्तव में उस जन्म में तथागत बुद्ध वह तोता स्वयं थे! बुद्ध अपने पर्व जन्म की इस कहानी के द्वारा यह बतला रहे हैं कि मन में हमेशा कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए, कृतज्ञता का भाव बनाये रखना एक कुशल कार्य है इससे निब्बान प्राप्ति में सफलता मिलती है। अपना मतलब सिद्ध हो जाने के बाद जिसने समय पर आपका साथ दिया हो उसे छोड़ नहीं देना चाहिए।

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