बुद्धिमान पुरुष अपने चित्त की रक्षा करके प्रसन्नता से जीते हैं एक युवा उत्कण्ठित भिक्षु की कथा (3.4:36) ||Verse 36||


बुद्धिमान पुरुष अपने चित्त की रक्षा करके प्रसन्नता से जीते हैं 
एक युवा उत्कण्ठित भिक्षु की कथा (3.4:36) ||Verse 36||
यह कथा उन दिनों की है, जब भगवान बुद्ध  जेतवन में रह रहे थे। एक दिन एक बड़ी उम्र का भिक्षु किसी व्यापारी-उपासक के घर भोजन-दान लेने के लिए गया, भोजन-दान के बाद व्यापारी के युवा पुत्र ने विनम्रता कर पूछा, "भन्ते'! जीवन के दुःखों से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए, कृपया मार्ग बताइये।" भिक्षु ने समझाया, "अपनी सम्पत्ति के तीन भाग करके ¬¬–एक भाग से व्यापार करो, दूसरे भाग से परिवार चलाओ और तीसरे भाग को धर्म के काम करो।' व्यापारी ने भिक्षु के बतलाये अनुसार अपनी संपत्ति का विभाजन कर दिया, पर उसका मन नहीं यह मान नहीं पा रहा था कि ऐसा करने से वह अपने मन में उत्पन्न विकारों से पैदा हुए दुःखों से मुक्त हो पाएगा। अत: वह भिक्षु के पास पुनः गया और पूछने लगा कि उसे आगे और क्या करना चाहिए। इस बार भिक्षु ने उसे समझाया, "सर्वप्रथम उसे त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म और संघ) में दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए। 

उसके बाद उसे पंचशील के नियमों अर्थात् – १। कभी चोरी नहीं करना २। किसी भी प्रकार का झूठ नहीं बोलना ३। किसी भी प्राणी को दुख: नहीं पहुँचाना (हिंसा) नहीं करना (४) कभी भी मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना और (५) किसी पराई स्त्री के साथ कामाचार न तो करना और नाहीं उसका विचार मन में लाना। 

जब इतना करने में वह निपुण हो जाये तब उसे आगे बढ़ना चाहिए और बुद्ध के बतलाये दस विनयों का पालन करना शुरू करना चाहिए, जब दस विनयों में निपुण हो जाये तब तीस विनय के नियमों का पालन शुरू करे और अंत में भिक्षु बन कर बुद्ध के बताए 227-शील, विपस्सना से समाधि और प्रज्ञा जगाने का अभ्यास करते रहना चाहिए |" 

व्यापारी के पुत्र तुरंत भिक्षु बन गया मगर बुद्ध के बतलाये शीलों का जीवन में पालन करना कठिन लग रहा था, अतः वह फिर से गृहस्थ-धर्म में लौटने के बारे में सोचकर समय काटने लगा। ऐसा करने से वह अपनी साधना के प्रति लापरवाह हो गया, चिंता से उसका शरीर से कमजोर हो गया। 

जब भगवान बुद्ध को व्यापारी के पुत्र की दशा की जानकारी मिली, तब उन्होंने हाल ही में भिक्षु बने उस व्यापारी के पुत्र को पास बुलाकर पूछा "भिक्षु, क्या तुम यहाँ पर असंतुष्ट हो?" भिक्षु हुए व्यापारी-पुत्र ने कहा “हाँ, आदरणीय, मैं कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भिक्षु बन तो गया हूँ लेकिन बड़े कष्ट में हूँ क्योंकि यहां तो हाथ फैलाने तक की जगह नहीं है। कृपया बतलाइए कि क्या मेरे लिए एक गृहस्थ का जीवन बिताते हुए दुखों से मुक्ति पाना संभव है?” बुद्ध ने समझाया, "प्रिय भिक्षु, यदि गृहस्थ जीवन बिताते हुए तुम किसी एक चीज़ की रक्षा कर सकते हो, तो बाकी किसी चीज़ों की रक्षा करना तुम्हारे लिए आवश्यक नहीं होगा और तुम्हें अपने दुखों: से मुक्ति मिल जाएगी।" युवा भिक्षु ने तुरंत पूछा – "वह क्या है, आदरणीय?" तथागत बुद्ध ने एक बार फिर कहा "क्या गृहस्थ जीवन में तुम अपने मन में उठते विचारों से स्वयं की रक्षा कर सकते हो तो यह संभव है कि तुम अपने दुखों: से मुक्त हो जाओ!" युवा भिक्षु ने कहा आदरणीय, वह ऐसा कर सकता है इसे सुनकर बुद्ध के उसे अपना आशीर्वाद देकर कहा "तो फिर जाओ और सदैव अपने मन में उठते विचारों के प्रति सावधान रहकर उनसे अपनी रक्षा करो।"

प्रसंग और (श्लोक 36) से मिलने वाली शिक्षा: 
मन में उठने वाले विचार जल्दी आते-जाते रहते हैं कि उस पर काबू पाना मुश्किल होता है। मन  जो कुछ भी पसंद करता है उसी पर चला जाता है इसलिए “ध्यान करते समय” कठिनाई होती है  मगर सजगता के साथ, मन को किसी एक स्थान पर केंद्रित करने से उसे (मन) वश में करने के में मदद मिलती है। यही सभी के लिये अच्छा और अत्यधिक लाभकारी है क्योंकि वश में किया गया मन, दुखों: से मुक्ति और आनंद लाता है। 


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